कषाय उनको कहते है,जो संसार चक्र को चालू रखे,क्रोध मान माया लोभ इन चार कषायों को जीतना बडा कठिन है,यदि इन चारों को तीन साल तक भूखा रखें तो वे भाग जायेंगे,उनका रक्षण करना ही उनकी खुराक है,इन चारों में मान नामक कषाय को जीतना बहुत ही कठिन है,ज्ञानी पुरुष दादा भगवान ने ओ यहां तक कहा है कि यदि यह मान नाम की गांठ न होती तो इन्सान का मोक्ष तो सहज ही हो जाता,इस मान को लेकर ही अटके और भटके हैं सब,माया संसार जाल का यह मान नाम का बेटा जब तक जिंदा है,तब तक उसके दूसरे बेटे क्रोध माया लोभ को कितनी बार ही क्यों न मारा जाये,मगर वे वापिस जिन्दा हो जायेंगे,यानी संसार चक्र चालू ही रहेगा.
लोग मान देते है,उसे चखने में कोई हर्ज नही पर अंतर में ऐसा रहना चाहिये कि यह नही होना चाहिये,मान है तब तक मनुष्य का कुरूप दिखाई देता है,और फ़लस्वरूप किसी को भी उसके प्रति आकर्षण नही रहता है.
अपमान का असर कब तक होता है जब तक मान की भीख है,तब तक,सभी तरह की भीख चलीं जाती है,लेकिन मान नामकी भीख जान अबहुत मुश्किल है,अपमान करने वाला जब उपकारी लगेगा तब हमारा मान टूटेगा,उन्होने मेरा अपमान किया ऐसे भाव में बडी आत्म हानि होती है,जिनकी मानकी गांठ बडी होती है,उन्हे हमेशा यह भय रहता है,कि कही पर अपमान न हो जाये,और कहीं से भी मान मिले,ऐसी भूख भी रहती है,अपमान का भय तो उन्हे इतना अधिक रहता है कि जगत के सुख भी वे भोग नही सकते.
मनुष्य की उसकी खुद की इन्सल्ट (अपमान) जर सी भी पसंद नही,और दूसरे वे लोगों की इन्सल्ट करने में अपना बडप्पन समझते है,इसे मानवता तो नही कहा जा सकता.
मान यदि फ़ूड है,तो अपमान विटामिन है,अपमान को पचाना बहुत बडी शूरवीरता कही जाती है,जितना ऊपर बैठेंगे,उतना ही नीचे गिरने का डर रहेगा,हमारे अंदर अहंकार है, या नही,यह तो कोई अपमान करे तभी पता लग सकता है,यदि कोई अपमान करे और समझ कर उसे जमा कर लें,तो शक्तियां उत्पन्न होती है,जो अपमान को समझ के निगलना जानता है,वही शक्ति शाली कहलाता है.
अभिमान यानी मान का विज्ञापन,स्वमान यानी अपमान,न हो इसका ध्यान रखना चाहिये,व्यवहार में स्वमान सदगुण कहलाता है,और अभिमान दुर्गुण कहलाता है.
कोई हमे हाथ जोडे आइये आइये कहकर हमारा आदर सत्कार करे,और वही अगर हमारी छाती फ़ूलने लगती है,तो फ़िर वह घाटे का सौदा है,इसमे सामने वाला तो अपना फ़र्ज निभाता है,इसी लिये आइये आइये कहता है,लेकिन हमे तो कमजोर नही पडना चाहिये,हमे अपने जमा उधार वाली बही को तुरंत देख लेना चाहिये,कि कहां पर घाटा और खा पर फ़ायदा हुआ है,जिन्हे मान खाने की बहुत आदत पड जाती है,वे अधिकतर धोखा खाते है.
मान का तो ऐसा है कि कुछ हद तक अपमान होता है,तब व्यवहार में मान के प्रति बेफ़िक्र बन जाते है,और कुछ हद तक मान मिलता ही रहे तो मान को पुष्टि मिल जाती है,और यदि बहुत मान मिल जाये,तो उसकी मान की भूख मिट जाती है,जब अपमान का डर ही नही रहेगा तो कोई अपमान करेगा ही नही,ऐसा नियम है,जब तक भय तब तक मान अपमान का व्यापार चालू है,भय निकला और मान अपमान की दुकानदारी बंद.
Jay
Wednesday, May 28, 2008
Thursday, August 2, 2007
सच्चे गुरू को पहिचाना कैसे जाये
कोई भी ज्ञान गुरु के बिना मिल नही सकता,संसारिक ज्ञान हो,अथवा आध्यात्मिक ज्ञान,सभी में गुरु की आवश्यक्ता जरूर पडती है,प्रथम गुरु माता है,बाद मे पाठशाला मे गुरुजन,किताबें और दूसरे लोगों और संसार के चर और अचर कारकों से हम सीखते हैं,इसलिये उन्हें भी गुरु कहा जाता है,इस प्रकार से देखें तो पूरा संसार ही गुरु है,बचपन से लेकर आद्यात्मिकता तक गुरु ही ले जाते हैं,और सदगुरु हमे आत्मा के पास ले जाते हैं ।
जब हम बीमार होते हैं तो डाक्टर की राय के अनुसार चलते हैं,रास्ता भूल जायें,तो कोई छोटा बच्चा भी हमे रास्ता बता देता है,आध्यात्मिक मे जो कुछ हम करेंगे वह हम अपनी मरजी से करेंगे,जो रास्ता हमने कभी देखा नही,उस रास्ते पर चलने के लिये हमे गुरु की मदद चाहिये या नही,जो अपनी समझ से ही आगे चलते है,स्वछंदता से घूमते है,उनको कभी मोक्श नही मिलता है,जीवन मे अपने ऊपर या गुरु का होना हमारे लिये बहुत ही आवश्यक है,जिसके बिना स्वछंदता को रोका नही जा सकता है,श्री मद रामचन्द्र ने भी कहा है कि "रोके जीव स्वछंद तो पाये अवश्य मोक्ष"।
गुरु तो किन्हे कहा जाये, ? जिनको देख कर हमारा शीश श्रद्धा से झुक जाये,जिन्हे देखने मात्र से हे हमारे मन को ठन्डक मिले,और सन्सार को हम भूल जायें,उनको ही गुरु माना जा सकता है। जो अन्तर्ध्यान और रौद्रध्यान का त्याग करवा कर धर्मध्यान करवा सके,जिन्हें कोई गाली दे,तो वे रौद्रध्यान न हों,आहार न मिले तो अन्तर्ध्यान न हों,तो समझना चाहिये कि वे हामारे गुरु बनने लायक हैं,उनके अन्दर जरा सी भी किसी वस्तु के प्रति आशक्ति नही होनी चाहिये,गुरु और चेला में स्वार्थ नही होना चाहिये।
आजकल तो लोग लोभी और लालची हो गये हैं,ऐसे मे उनको गुरु भी ठगने वाले मिलते हैं,लोगों को लालच रहता है,कि मेरे घर पर लडका हो,मेरा व्यवसाय चले,इस लिये गुरु भी ऐसे ही मिल जाते हैं,लोग टेढे चलते है तो गुरु भी टेढे चलते हैं।
जहाँ पर लक्ष्मी का व्यवहार है,उधर गुरु हो ही नही सकते,अगर सत्संग मे जाने के लिये टिकट है,तो वह सत्संग न होकर नाटक है,जहाँ गुरु पैसे और स्त्री के भिखारी हैं,वहाँ से अपने को चुपचाप निकलने मे ही भलाई है।
प्रश्न यह उठता है कि सच्चे गुरु की पहिचान किस प्रकार से हो? जिनको हम गाली दें,और उनको हमे क्षमा देनी न पडे,जो क्षमा हो वह सहज क्षमा हो,उनका हम चाहे जैसे भी अपमान करें,फिर भी उनकी तरफ़ से क्षमा ही हो,वे सरल हों,जो हमसे किसी चीज का लालच नही रखते हों,जिनको कितना ही छेडा जाये,परेशान किया जाये,फिर भी वे रोद्राध्याय की तरफ़ न जायें,फुन्कार न मारें,उनको ही गुरु के रूप मे स्वीकार कर सकते हैं,जिनके अन्दर राग और द्वेष नही होता है वे ही अन्तिम गुरु होते हैं,जिनके सामने हम भोजन की थाली रख कर वापस उठालें,और उनके चेहर पर कोई सिकन न आये,तो समझ लेना चाहिये कि वे ही अन्तिम गुरु हैं,जो फूलों की माला पहिनाने से खुश न हों और गाली देने से रुष्त न हो,वे ही सच्चे गुरु हैं,जिनके पास बैठने से मन को ठन्डक मिले वे ही सच्चे गुरु हैं,क्रोध,मान,माया,लोभ,मोह,राग-द्वेष,जिनके अन्दर नही है वे ही सदगुरु है। सदगुरु को पाने के लिये,परम विनय और मै कुछ नही हूँ और कुछ नही जानता,इस प्रकार के भाव रहने चाहिये।
जो सदगुरु हैं वे आत्मा का प्रयोग करते है,वे इस प्रकार की बातें कहते है,जो न तो कहीं पढी है और न ही कही लिखी है,जिनका अपना आत्म दीप प्रज्वलित हो गया है और जो दूसरों का भी आत्म दीप प्र्ज्वलित कर सकते हैं।
गुरु वे ही होते हैं जो शिष्य पर कभी नाराज नही होते हैं,बल्कि उनका रक्षण करते हैं,शिष्य गुरु के सहारे ही होता है ,शिष्यों की पूरी चिन्ता गुरु के ऊपर ही होती है,क्योंकि शिष्य बेचारा कर क्या सकता है,बिना गुरु के।कितने ही गुरु कहते है अभ्यास कीजिये,साधना कीजिये,इन सब से मन वांछित वस्तु मिल जायेगी,यह करिये,वह करिये,माला फ़ेरिये,यह सब क्या है,किताबों मे लिखा है कि प्रमाणिकता पर चलिये,लाखो अवतार यही सब कुछ करते आये हैं,कर कर किया है,कर कुछ नही पाये हैं,मानव अपने हाथ से कुछ नही कर सकता है,सब कुछ गुरु के आधीन है,शिष्य केवल विनय करना जानता है,बाकी का काम तो गुरु का होता है।
गुरु के मिलने से सही राह मिल जाती है,सतगुरु से आत्मा का कल्यान हो जाता है,जो जीते जी मोक्श रूपी रोकड देते है,वे ही सदगुरु होते हैं,सदगुरु खुद भी संसार से मुक्त रहते हैं,और शिष्य को भी मुक्त करते हैं,सच्चे गुरु से विनय पूर्वक प्रश्न करे कि उनको तो मुक्ति की राह मिल गई है,उसे भी चाहिये,और बिना प्रश्न किये बैठने से अवतारों के अन्दर भटकाव ही है।
मनुष्य जन्म बार बार नही मिलता है,और इस प्रकार से अमूल्य समय बरबाद करने से अमूल्य जीवन बरबाद ही हो जाता है,लोग तो एक ही गुरु को पकड कर बैठ जाते हैं,लेकिन हमें एक ही जगह पर अटकना नही चाहिये,यदि गुरु हमारे प्रशनो का समाधान नही दे सके,तो गुरु को बदल देना चाहिये,इस प्रकार से तलाश करते करते एक दिन सच्चे गुरु मिल ही जायेंगे। सच्ची लगन से तलाश करने से क्या नही मिल सकता है। जहां चाह होती है,वहीं राह होती है,सदगुरु अगर भेद विज्ञानी है,तो वे हमारे कर्मों को भस्मीभूत करके आत्मा का लक्ष्य स्थापित कर देंगे,यदि हमे अहंकार से मुक्त होना है,तो ऐसे सदगुरु की आवश्यक्ता है,जिनमे अहंकार न हो,अहंकार को निरमूल करना गुरु का काम नही है,इसको दूर करने के लिये ज्ञानी पुरुष की आवश्यकता पडती है,कोई ऐसे ज्ञानी पुरुष हमे मिल जायें,जिनमे बुद्धि लेश मात्र भी नही है,क्रोध मान माया लोभ,आदि के कषायु परमाणु ही नही है,ऐसी जिनकी देहातीत अवस्था है,जो अपने देह के ,मन के, वाणी के,मालिक नही हैं,उनकी दया से अहंकार निर्मूल हो सकता है,और आत्मा को कहां जाना है,पता लग सकता है,ऐसे ज्ञानी पुरुष अपने शिष्य का कल्याण नियम से रोजाना करते हैं,वे अपने को कर्ता नही मानते हैं,वे गुरु होने के बावजूद,गुरु पद मे नही रहते हैं। वे तो सम्पूर्ण जगत को अपना गुरु मानते है और संसार के शिष्य बन कर रहना चाहते हैं। जिनमे यह भाव है वे ही गुरु बनने का अधिकार है। अन्त मे ऐसे ही सतपुरुष को खोज कर उनके चरण कमल मे सम्पूर्ण भावो को अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
जब हम बीमार होते हैं तो डाक्टर की राय के अनुसार चलते हैं,रास्ता भूल जायें,तो कोई छोटा बच्चा भी हमे रास्ता बता देता है,आध्यात्मिक मे जो कुछ हम करेंगे वह हम अपनी मरजी से करेंगे,जो रास्ता हमने कभी देखा नही,उस रास्ते पर चलने के लिये हमे गुरु की मदद चाहिये या नही,जो अपनी समझ से ही आगे चलते है,स्वछंदता से घूमते है,उनको कभी मोक्श नही मिलता है,जीवन मे अपने ऊपर या गुरु का होना हमारे लिये बहुत ही आवश्यक है,जिसके बिना स्वछंदता को रोका नही जा सकता है,श्री मद रामचन्द्र ने भी कहा है कि "रोके जीव स्वछंद तो पाये अवश्य मोक्ष"।
गुरु तो किन्हे कहा जाये, ? जिनको देख कर हमारा शीश श्रद्धा से झुक जाये,जिन्हे देखने मात्र से हे हमारे मन को ठन्डक मिले,और सन्सार को हम भूल जायें,उनको ही गुरु माना जा सकता है। जो अन्तर्ध्यान और रौद्रध्यान का त्याग करवा कर धर्मध्यान करवा सके,जिन्हें कोई गाली दे,तो वे रौद्रध्यान न हों,आहार न मिले तो अन्तर्ध्यान न हों,तो समझना चाहिये कि वे हामारे गुरु बनने लायक हैं,उनके अन्दर जरा सी भी किसी वस्तु के प्रति आशक्ति नही होनी चाहिये,गुरु और चेला में स्वार्थ नही होना चाहिये।
आजकल तो लोग लोभी और लालची हो गये हैं,ऐसे मे उनको गुरु भी ठगने वाले मिलते हैं,लोगों को लालच रहता है,कि मेरे घर पर लडका हो,मेरा व्यवसाय चले,इस लिये गुरु भी ऐसे ही मिल जाते हैं,लोग टेढे चलते है तो गुरु भी टेढे चलते हैं।
जहाँ पर लक्ष्मी का व्यवहार है,उधर गुरु हो ही नही सकते,अगर सत्संग मे जाने के लिये टिकट है,तो वह सत्संग न होकर नाटक है,जहाँ गुरु पैसे और स्त्री के भिखारी हैं,वहाँ से अपने को चुपचाप निकलने मे ही भलाई है।
प्रश्न यह उठता है कि सच्चे गुरु की पहिचान किस प्रकार से हो? जिनको हम गाली दें,और उनको हमे क्षमा देनी न पडे,जो क्षमा हो वह सहज क्षमा हो,उनका हम चाहे जैसे भी अपमान करें,फिर भी उनकी तरफ़ से क्षमा ही हो,वे सरल हों,जो हमसे किसी चीज का लालच नही रखते हों,जिनको कितना ही छेडा जाये,परेशान किया जाये,फिर भी वे रोद्राध्याय की तरफ़ न जायें,फुन्कार न मारें,उनको ही गुरु के रूप मे स्वीकार कर सकते हैं,जिनके अन्दर राग और द्वेष नही होता है वे ही अन्तिम गुरु होते हैं,जिनके सामने हम भोजन की थाली रख कर वापस उठालें,और उनके चेहर पर कोई सिकन न आये,तो समझ लेना चाहिये कि वे ही अन्तिम गुरु हैं,जो फूलों की माला पहिनाने से खुश न हों और गाली देने से रुष्त न हो,वे ही सच्चे गुरु हैं,जिनके पास बैठने से मन को ठन्डक मिले वे ही सच्चे गुरु हैं,क्रोध,मान,माया,लोभ,मोह,राग-द्वेष,जिनके अन्दर नही है वे ही सदगुरु है। सदगुरु को पाने के लिये,परम विनय और मै कुछ नही हूँ और कुछ नही जानता,इस प्रकार के भाव रहने चाहिये।
जो सदगुरु हैं वे आत्मा का प्रयोग करते है,वे इस प्रकार की बातें कहते है,जो न तो कहीं पढी है और न ही कही लिखी है,जिनका अपना आत्म दीप प्रज्वलित हो गया है और जो दूसरों का भी आत्म दीप प्र्ज्वलित कर सकते हैं।
गुरु वे ही होते हैं जो शिष्य पर कभी नाराज नही होते हैं,बल्कि उनका रक्षण करते हैं,शिष्य गुरु के सहारे ही होता है ,शिष्यों की पूरी चिन्ता गुरु के ऊपर ही होती है,क्योंकि शिष्य बेचारा कर क्या सकता है,बिना गुरु के।कितने ही गुरु कहते है अभ्यास कीजिये,साधना कीजिये,इन सब से मन वांछित वस्तु मिल जायेगी,यह करिये,वह करिये,माला फ़ेरिये,यह सब क्या है,किताबों मे लिखा है कि प्रमाणिकता पर चलिये,लाखो अवतार यही सब कुछ करते आये हैं,कर कर किया है,कर कुछ नही पाये हैं,मानव अपने हाथ से कुछ नही कर सकता है,सब कुछ गुरु के आधीन है,शिष्य केवल विनय करना जानता है,बाकी का काम तो गुरु का होता है।
गुरु के मिलने से सही राह मिल जाती है,सतगुरु से आत्मा का कल्यान हो जाता है,जो जीते जी मोक्श रूपी रोकड देते है,वे ही सदगुरु होते हैं,सदगुरु खुद भी संसार से मुक्त रहते हैं,और शिष्य को भी मुक्त करते हैं,सच्चे गुरु से विनय पूर्वक प्रश्न करे कि उनको तो मुक्ति की राह मिल गई है,उसे भी चाहिये,और बिना प्रश्न किये बैठने से अवतारों के अन्दर भटकाव ही है।
मनुष्य जन्म बार बार नही मिलता है,और इस प्रकार से अमूल्य समय बरबाद करने से अमूल्य जीवन बरबाद ही हो जाता है,लोग तो एक ही गुरु को पकड कर बैठ जाते हैं,लेकिन हमें एक ही जगह पर अटकना नही चाहिये,यदि गुरु हमारे प्रशनो का समाधान नही दे सके,तो गुरु को बदल देना चाहिये,इस प्रकार से तलाश करते करते एक दिन सच्चे गुरु मिल ही जायेंगे। सच्ची लगन से तलाश करने से क्या नही मिल सकता है। जहां चाह होती है,वहीं राह होती है,सदगुरु अगर भेद विज्ञानी है,तो वे हमारे कर्मों को भस्मीभूत करके आत्मा का लक्ष्य स्थापित कर देंगे,यदि हमे अहंकार से मुक्त होना है,तो ऐसे सदगुरु की आवश्यक्ता है,जिनमे अहंकार न हो,अहंकार को निरमूल करना गुरु का काम नही है,इसको दूर करने के लिये ज्ञानी पुरुष की आवश्यकता पडती है,कोई ऐसे ज्ञानी पुरुष हमे मिल जायें,जिनमे बुद्धि लेश मात्र भी नही है,क्रोध मान माया लोभ,आदि के कषायु परमाणु ही नही है,ऐसी जिनकी देहातीत अवस्था है,जो अपने देह के ,मन के, वाणी के,मालिक नही हैं,उनकी दया से अहंकार निर्मूल हो सकता है,और आत्मा को कहां जाना है,पता लग सकता है,ऐसे ज्ञानी पुरुष अपने शिष्य का कल्याण नियम से रोजाना करते हैं,वे अपने को कर्ता नही मानते हैं,वे गुरु होने के बावजूद,गुरु पद मे नही रहते हैं। वे तो सम्पूर्ण जगत को अपना गुरु मानते है और संसार के शिष्य बन कर रहना चाहते हैं। जिनमे यह भाव है वे ही गुरु बनने का अधिकार है। अन्त मे ऐसे ही सतपुरुष को खोज कर उनके चरण कमल मे सम्पूर्ण भावो को अर्पित करने से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।
हमारा अवाधित अधिकार सनातन सुख
सुख ही चाहिये,सिर्फ सुख ही सुख अच्छा लगता है,......बस आनंद और आनंद ! मुझे आपको व हम सभी को सुख ही चाहिए | सुख ही अच्छा लगता है, है न ? और दुःख ? कौन चाहता है दुःख ? जगत मे हम जो कुछ भी करते है,सब सुख के लिए ही करते है,अनादि से चहल पहल से चहकती हुई इस धरती की एक ही धडकन है,एक ही पुकार है,:दुख को हटाओ,सुख को पाओ,"सन्सार की यह सारी दौड भाग,सभी सान्सारिक प्रव्रत्तियां-जैसे शिक्षा,नौकरी,व्यापार,संघर्ष,भोग-विलास,खाना-पीना,वाह वाही की भूख,आनन्द प्रमोद के माध्यम,केन्द्र व क्लब,भजन प्रवचन,ध्यान,तप जप,भक्ति-ये सब कुछ सुख सुविधा को प्राप्त करने की आन्तरिक भावना के तट:स्थल पर शुरु होती है ।
सभी सांसारिक सुख क्षणिक हैं,ये विनाशी सुख कुछ देर के लिये हमारे मन को जकड सकते है-बान्ध सकते हैं,चकनाचूर चित्त को पकड सकते है,या थोडी देर के लिये हमारी उलझनो पर या दुख दर्द पर परदा भी गिरा सकते हैं,जैसे तपती हुई धूप में बबूल की छाया से भी कुछ ठंडक,कुछ आराम मिल सकता है,मगर फ़िर वापिस वही का वही का्लचक्र ! फ़िर से उसी चक्की मे पिसते पिसाते चले जाते हैं,ऐसे जीवन के सारांश रूप मे एक कवि ने कहा है,मानव जीवन मे सुख कम और दुख अधिक होते हैं ।
तो अब प्रश्न यह उठता है,कि क्या मनुष्य जन्म दुख झेलने के लिये है ? नहीं, नहीं जी । तो क्या सुख कायमी सुख अर्थात सनातन सुख की प्राप्ति हो सकती है ? अवश्य । यह तो मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार है । सनातन सुख की खोज एवं प्राप्ति के लिये ही यह देह प्राप्त हुई है । अच्छा ! तो फिर अधिक सुख पाने के लिये अधिक बुद्धि दौडानी पडती होगी ? जप,तप,ध्यान करने पडते होंगे ? भारी पुरुषार्थ करना पडता होगा ? बहुत सी कुर्बानियां देनी पडती होंगी ? कुछ ग्रहण करना और कुछ त्यागना पडता होगा ? जीवन की शैली,जीवन की राह बदलनी होगी ? नहीं नहीं ! तो फिर कुछ तो करना ही पडता होगा न ? नहीं जनाब !ऐसा कुछ भी करने की आवश्यकता नही है । सुख तो हमारा स्वभाव है । सुख तो हमारे भीतर लबालब भरा पडा है,मुझमें,आपमें,हम सभी के अन्दर,सुख का भन्डार भरा हुआ है,जरूरत है केवल भन्डार खोलने की ! भन्डार के ताले का कोड नम्बर जान लें और उसके मुताबिक लगायें,तो ताला अपने आप ही खुल जायेगा । सुख की सम्रद्धी छलकती रहे और अविरत आनन्द बहता रहे,ऐसा अपार व अखूट भन्डार खुलेगा ।
कैसी अनौखी बात है यह,है न ! ऐसा देखा है कहीं ? जी हाँ ! तभी तो आपको बता रहा हूँ । मैने और मुझ जैसे हजारों लोगों ने देखा है । दिन रात,आधि व्याधि उपाधि में भी समाधि रहे,ऐसा सुख हमे मिला है । इसी अहोभाव से प्रेरित मेरे ये शब्द निकले हैं । यह सब हमने देखा "दादा भगवान" में ! उनसे हमें सनातन सुख की चाबी मिली । उनके अक्रम विज्ञान से हमारी सभी उलझने दूर हो गई,सभी प्रश्नो के समाधान मिले । निराकुल,निजानन्द पाया जो कभी कम नही होता बल्कि निरंतर् बढता ही रहता है,जिसे कोई चुरा नही सकता है,लूट नही सकता है,जिसे संभालने की चिन्ता नही,डर नहीं । जिसके लिये किसी अवलम्बन या आधार की परवशता नहीं । अरे ! यह तो हमारा ही है,हमसे छिपा हुआ,परमतत्व है ।
दादा भगवान अर्थात ही तत्व रूप मे,सर्व काल,सर्वांग सनातन सुख ! उनका अपना दर असल स्वरूप पूर्ण रूप से निष्कंप निष्कशाय,परमज्योतिस्वरूप, उनमे प्रकाशित हुआ । यह प्रकाश पाया देश विदेश के लाखों लोगों ने,सार्थक बन गये उनके जीवन और जीते जी ही बन गये,वे जीवन मुक्त ! इसी लिये दादा भगवान के कविराज श्री नवनीत ने गाया है : जिस फोटो मे दिखाई देते हैं,वे ही हैं क्या दादा भगवान,नही वे दादा भगवान नही हो सकते है,वे तो भादरण गांव के ए।एम।पटेल हैं। उनके भीतर जो प्रकट हुये हैं,वे दादा भगवान हैं,इनका स्वरूप क्या है,ज्ञान,दरशन,चरित्र एवं तप-यह उनका स्वरूप है । शुद्ध ज्ञान दर्शन-चरित्र व तप के रूप मे जो अनुभव मे आते हैं,वे दादा भगवान है,यह जो देह रूपी है वह तो पटेल है । यह देह तो नाशवंत है,क्षणभन्गुर है,पानी का एक बुलबुला है,जिसके फ़ूट जाने पर उसको जला दिया जायेगा,जब कि दादा भगवान को कोई जला नही सकता है,क्योंकि अग्नि स्थूल स्वरूपी है,जबकि आत्मा सूक्षम स्वरूप है । स्थूल सूक्षम को कैसे जला सकता है। ऐसे ही शुद्ध ज्ञान दर्शन चरित्र तपके रूप मे रहे हुए दादा भगवान आपके भीतर भी विराजमान हैं ! और वह स्वयं आप ही हैं।
मूल निमित्ते निजानान्दी निर्माण हुआ -जयमेश शाह
सन्सार विघ्न-निवारक निष्पक्ष्पाती
दादा भगवान त्रिमंत्र
नमो अरिहंताणं
नमो सिद्धाणं
नमो आयरियाणं
नमो उव्वज्झायाणं
नमो लोए सव्वसाहूणं
ऐसो पंच नमुक्कारो
सव्व पावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं
पढमं हवई मंगलं
औम नमो भगवते वासुदेवाय
औम नम: शिवाये
जय सच्चिदानन्द
दादा भगवान त्रिमंत्र
नमो अरिहंताणं
नमो सिद्धाणं
नमो आयरियाणं
नमो उव्वज्झायाणं
नमो लोए सव्वसाहूणं
ऐसो पंच नमुक्कारो
सव्व पावप्पणासणो
मंगलाणं च सव्वेसिं
पढमं हवई मंगलं
औम नमो भगवते वासुदेवाय
औम नम: शिवाये
जय सच्चिदानन्द
Subscribe to:
Posts (Atom)